भाग – 3
12
तुर्बीन के छोटे से शयन कक्ष की दो
खिड़कियों पर जो कांच लगे बरामदे में खुलती थीं काले परदे लग गए. कमरे में शाम का
धुंधलका भर गया, और एलेना का सिर उसमें चमक रहा था. उसके जवाब में तकिये पर एक
सफ़ेद धब्बा – तुर्बीन का चेहरा और गर्दन – चमक रहा था. प्लग में लगा तार सांप की
भाँति रेंगते हुए कुर्सी की ओर गया था, और लैम्पशेड में गुलाबी बल्ब जल उठा
और उसने दिन को रात में परिवर्तित कर दिया. तुर्बीन ने एलेना को दरवाज़ा बंद करने
का इशारा किया.
“अन्यूता को फ़ौरन आगाह करना होगा
कि चुप रहे...”
“जानती हूँ, जानती हूँ...तुम
बोलो नहीं, अल्योशा, ज़्यादा.”
“मैं खुद
भी जानता हूं...मैं हौले से...आह, अगर हाथ बेकार हो जाए तो!”
“अरे, क्या कह
रहे हो, अल्योशा...लेटे रहो, चुप
रहो...इस महिला का कोट तो फ़िलहाल हमारे पास रहेगा?”
“हाँ, हाँ. निकोल्का
उसे वापस लौटाने की कोशिश न करे. वर्ना, रास्ते
पर...सुन रही हो? वैसे भी, खुदा के
लिए, उसे कहीं बाहर न निकलने देना.”
“खुदा उसे
तंदुरुस्त रखे,” एलेना ने तहे दिल से, कोमलता
से कहा, “और, कहते हैं, कि
दुनिया में भले लोग नहीं होते...”
ज़ख़्मी के
गालों पर हल्की-सी लाली छा गई, और आंखें सफ़ेद, नीची छत
पर टिक गईं, फिर उसने उन्हें एलेना की ओर
घुमाया, और तेवर चढ़ाकर पूछा:
“हाँ, माफ़ करना, ये कौन
मेंढक टर्रा रहा था?”
एलेना
गुलाबी किरण में कुछ झुकी और उसने कंधे उचका दिए.
“पता है, तुमसे
ठीक पहले, करीब दो मिनट पहले, ज़्यादा
नहीं, वह प्रकट हुआ: सिर्योझा का भतीजा, झितोमिर
से. तुमने तो सुना है: सुर्झान्स्की...लरियोन...अरे, वही
मशहूर लरिओसिक .”
“तो?”
“हमारे
यहाँ खत लेकर आया. उनके यहाँ कोई ड्रामा हुआ है. जैसे ही उसने बताना शुरू किया, वो
तुम्हें ले आई.”
“कोई पंछी
है, खुदा जाने...”
एलेना
हँसते हुए और आंखों में भय के साथ बिस्तर की ओर झुकी:
“क्या
पंछी!...वह हमारे यहाँ रहना चाहता है. मैं समझ नहीं पा रही हूँ, कि क्या किया
जाए.”
“र-हना?...”
“हाँ,
हाँ...सिर्फ तुम चुप रहो, और हिलो-डुलो नहीं, विनती
करती हूँ, अल्योशा...माँ मिन्नत कर रही है,
लिखती है, क्योंकि ये ही लरिओसिक उसका आदर्श
है...मैंने तो ऐसा बेवकूफ, जैसा ये लरिओसिक है, आज तक
नहीं देखा. हमारे यहाँ उसने आते ही सारी प्लेटें तोड़ दीं. नीला सेट. सिर्फ दो
प्लेटें बची हैं.”
“ओह, ये बात
है. मुझे नहीं मालूम कि क्या करना चाहिए...”
गुलाबी
छाया में बड़ी देर तक फुसफुसाहट होती रही. दूर दरवाजों और परदों के पीछे निकोल्का
की और अप्रत्याशित मेहमान की दबी-दबी आवाजें सुनाई दे रही थीं. एलेना हाथ फैलाकर अलेक्सेई
से कम बोलने की विनती कर रही थी. डाइनिंग हॉल में खडखडाहट सुनाई दे रही थी – गुस्साई
अन्यूता झाडू से नीले सेट के टुकडे हटा रही थी. आखिरकार, फुसफुसाते हुए फैसला किया
गया. इस बात को ध्यान में रखते हुए कि शहर में आजकल शैतान जाने क्या हो रहा है और
काफी संभव है कि कमरों की मांग करने आ जाएँ, इस बात
को ध्यान में रखते हुए, कि पैसे नहीं हैं, और लरिओसिक
के लिए पैसे देने वाले हैं, - लरिओसिक
को रख लेंगे. मगर उसे तुर्बीन परिवार के
नियमों का पालन करने के लिए बाध्य करना होगा. जहाँ तक पंछी का सवाल है – उसे कुछ
दिनों तक देखा जाए. अगर पंछी घर में बर्दाश्त के बाहर हो जाए, तो उसे
छोड़ देने की मांग की जाए, मगर उसके मालिक को रहने दिया जाए. जहाँ तक क्रॉकरी का
सवाल है, ये देखते हुए कि, बेशक, एलेना की
जुबान नहीं खुलेगी, और वैसे भी ये बदतमीजी और
दादागिरी होगी, - क्रॉकरी के बारे में भूल जाएँ. लरिओसिक
को किताबों वाले कमरे में रखा जाए, वहाँ
पलंग और स्प्रिंग वाला गद्दा और एक छोटी सी मेज़ रख दी जाए...
एलेना
डाइनिंग रूम में आई. लरिओसिक उदास खडा था, सिर
लटकाए और उस जगह की और देखते हुए, जहाँ कभी अलमारी में बारह प्लेटों
की गड्डी होती थी. धुंधली-नीली आंखें पूरी उदासी को प्रकट कर रही थीं. निकोल्का लरिओसिक
के सामने मुँह खोले खडा था, और कोई
किस्सा सुन रहा था. निकोल्का की आंखों में तनावपूर्ण उत्सुकता झाँक रही थी.
“झितोमिर
में चमड़ा ही नहीं है,” लरिओसिक परेशानी से कह रहा था, “समझ रहे
हैं, बिलकुल नहीं है. वैसा चमड़ा जैसा पहनने का मैं आदी
हूँ, नहीं है. मैंने सभी मोचियों से कहा, कि जो
मांगो, वो कीमत दूँगा, मगर नहीं
मिला. और इसलिए...”
एलेना को
देखकर लरिओसिक का मुख विवर्ण हो गया, उसने अपनी
ही जगह पर पैर बदले, और, न जाने
क्यों नीचे, उसके ड्रेसिंग गाऊन की पन्ने जैसी
झालर देखते हुए बोला:
“एलेना
वसील्येव्ना, मैं फ़ौरन दुकानों में जाऊंगा, उनसे
पूछूंगा, और आज ही आपके पास प्लेटों का सेट
आ जाएगा. मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि मुझे
क्या कहना चाहिए. आपसे माफ़ी कैसे माँगू? प्लेटों
के सेट के लिए तो मेरी जान ही लेना चाहिए. मैं खतरनाक रूप से नाकामयाब इन्सान
हूँ,” उसने निकोल्का से मुखातिब होकर कहा, “मैं इसी
समय दुकानों में जाऊंगा,” उसने एलेना से आगे कहा.
“मैं वाकई
में आपसे विनती करती हूँ, कि किसी भी दुकान में न जाएँ, ऊपर से, वे सब, बेशक, बंद हैं.
माफ़ कीजिये, क्या आपको मालूम नहीं है, कि हमारे
यहाँ शहर में क्या हो रहा है?”
“कैसे
नहीं जानूंगा!” लरिओसिक चहका. “मैं तो एम्बुलेन्स ट्रेन से आया हूँ, जैसा आपको
टेलीग्राम से पता चल गया होगा.”
“कौन से
टेलीग्राम से?” एलेना ने पूछा. “हमें कोई
टेलीग्राम नहीं मिला.”
“क्या?” लरिओसिक
का मुँह पूरा खुल गया. “नहीं मिला? आ-हा.
तभी, मैं देख रहा हूँ,” वह
निकोल्का की ओर मुड़ा, “ कि आप मेरी तरफ़ इतने अचरज से... मगर इजाज़त दीजिये...मम्मा
ने आपको त्रेसठ शब्दों का टेलीग्राम भेजा था.”
“त्स...त्स....त्रेसठ
शब्द!” निकोल्का चौंक गया. “कितने अफ़सोस की बात है. आजकल टेलीग्राम ठीक से नहीं
पहुँचते हैं. बल्कि, असल में तो वे पहुँचते ही नहीं
हैं.”
“तो, अब क्या
किया जाए?” लरिओसिक दुखी हो गया. “क्या आप
मुझे अपने यहाँ रहने की इजाज़त देंगे?” उसने
असहायता से चारों ओर देखा, और उसकी आंखों से फ़ौरन स्पष्ट हो गया
कि उसे तुर्बीनों के यहाँ बहुत अच्छा लग रहा है, और वह
कहीं और नहीं जाना चाहता.”
“सब
इंतज़ाम हो गया है,” एलेना ने जवाब दिया और उदारता से
सिर हिलाया, “हम तैयार हैं. रुक जाओ, और आराम
से रहो. देख रहे हो ना, कि हमारे यहाँ कैसी
दुर्भाग्यपूर्ण...”
लरिओसिक और भी ज़्यादा दुखी हो गया. उसकी आंखें आंसुओं के
कारण धुंधली हो गई,.
“एलेना
वसील्येव्ना,” उसने भावविह्वल होकर कहा, “आप
मुझसे जिस तरह की चाहें, मदद ले सकती हैं. पता है, मैं
लगातार तीन-चार दिनों तक बिना सोये रह सकता हूँ.”
“शुक्रिया,
बहुत-बहुत शुक्रिया.”
“और अब,” लरिओसिक
निकोल्का से मुखातिब हुआ, “क्या
मुझे कैंची मिल सकती है?”
अचरज और
दिलचस्पी से भौंचक्का निकोल्का, कहीं भागा और कैची के साथ लौटा. लरिओसिक
ने जैकेट के बटन को हाथ लगाया, आंखें
झपकाईं और फिर से निकोल्का से बोला;
“वैसे, माफी
चाहता हूँ, एक मिनट के लिए आपके कमरे में...”
निकोल्का
के कमरे में लरिओसिक ने जैकेट उतार दिया, बेहद
गंदी कमीज़ निकालकर, उसने कैची हाथ में ली, जैकेट का
काला चमकदार अस्तर फाड़ा, और उसके नीचे से हरा-पीला पैसों
का पैकेट निकाला. ये पैकेट वह शालीनता से डाइनिंग रूम में लाया और उसे एलेना के
सामने मेज़ पर यह कहते हुए रख दिया:
“एलेना
वसील्येव्ना, अपने खर्चे के लिए मुझे अभ्भी
आपको ये धनराशि देने की इजाज़त दें.”
“इतनी
जल्दी क्या है,” लाल होते हुए एलेना ने पूछा, “ये बाद
में भी हो सकता था...”
लरिओसिक ने जोरदार विरोध किया:
“नहीं, नहीं, एलेना
वसील्येव्ना, आप,
मेहेरबानी करके अभी ले लीजिये. खुदा के लिए, ऐसी कठिन
परिस्थिति में पैसों की सख्त ज़रुरत पड़ती है, यह मैं अच्छी तरह समझता हूं!” उसने
पैकेट खोला, उसमें से किसी औरत का फोटो भी बाहर गिरा. लरिओसिक ने चुपके से उसे उठाया और गहरी सांस लेकर जेब
में छुपा दिया. “ आपके लिए ये अच्छा रहेगा. मुझे क्या ज़रुरत है? मुझे
सिगरेट और कैनरी के लिए दाना खरीदना होगा...”
लरिओसिक के कार्यकलाप इतने समझदारी से पूर्ण और
समयानुकूल थे, कि एलेना एक मिनट के लिए अलेक्सेई
के ज़ख्म को भूल गई, और उसकी आंखों में प्यारी चमक
दिखाई दी .
“वैसे, वह इतना भी
बेवकूफ़ नहीं है, जितना मैंने शुरू में सोचा था,” उसने
सोचा, “नम्र और ईमानदार है, सिर्फ
कुछ सनकी है. प्लेटों का बेहद अफ़सोस है.”
“ये है
नमूना,” निकोल्का ने सोचा, लरिओसिक के आश्चर्यजनक आगमन ने उसके उदास विचारों को कम
कर दिया.
“ये आठ
हज़ार हैं,” प्याज़ के साथ तले हुए अंडे जैसा
नोटों का बण्डल मेज़ पर सरकाते हुए लरिओसिक ने कहा, “अगर कम हो, तो हम हिसाब कर लेंगे और
मैं फ़ौरन और दूँगा.”
“नहीं, नहीं, बाद में, ये बढ़िया
है,” एलेना ने जवाब दिया. “आप अब ऐसा कीजिये: मैं अभी
अन्यूता से कहती हूँ, कि वह आपके लिए नहाने का पानी गरम कर दे, और आप फ़ौरन नहा
लीजिये. मगर कहिये, आप आये कैसे, आप यहाँ
तक पहुंचे कैसे, समझ नहीं पा रही?” एलेना
पैसे समेट
कर उन्हें अपने गाऊन की बड़ी जेब में रखने लगी.
उस याद से
लरिओसिक की आँखों से डर झांकने लगा.
“ये खतरनाक
था!” प्रार्थना करते हुए प्रीस्ट की भाँति हाथ रखकर उसने कहा. “मैं नौ दिनों
से...नहीं, माफी चाहता हूँ, दस?...माफ़
कीजिये...इतवार, हाँ,
सोमवार...ग्यारह दिनों से झितोमिर से ट्रेन में सफ़र कर रहा हूँ...”
“ग्यारह
दिन!” निकोल्का चीखा. “देखा!” न जाने क्यों वह उलाहने से एलेना से मुखातिब हुआ.
“हाँ-आ,
ग्यारह...मैं चला, तो ट्रेन गेटमन की थी, मगर
रास्ते में पित्ल्यूरा की बन गई. और हम एक स्टेशन पर पहुंचे, क्या नाम
था, अरे,
वो...खुदा, भूल गया...कोई बात नहीं...और सोचो, वहाँ वे
मुझ पर गोली चलाने वाले थ. ये पित्ल्यूरा वाले आये, टोपियों
पर पूँछों वाले...”
“नीली?”
निकोल्का ने उत्सुकता से पूछा.
“लाल...हाँ
लाल पूँछों वाले...और चीखे:
“उतर! हम
अभी तुझे मार डालेंगे! उन्होंने फैसला कर लिया कि मैं ऑफिसर हूँ और एम्बुलेन्स
ट्रेन में छुपा हूँ. मगर मेरे पास बचने का एक ही रास्ता था...मम्मा डॉक्टर
कुरीत्स्की को जानती है.”
“कुरीत्स्की
को? निकोल्का गहरे अर्थ से चहका.
“तेक-स...बिल्ली...और
व्हेल. जानते हैं.”
“किति, कोत, किति, कोत,” दरवाज़े
के पीछे पंछी ने दबी आवाज़ में जवाब दिया.
“हाँ,
उसीको...वही हमारे यहाँ झितोमिर में ट्रेन लाया था...माय गॉड! मैं भगवान की
प्रार्थना करने लगा. सोचा, सब ख़त्म हो गया! और, पता है? पंछी ने
मुझे बचाया. मैंने कहा कि मैं ऑफिसर नहीं, पंछी
पालने वाला हूँ, मैंने उन्हें अपना पंछी दिखाया...तब, पता है, एक ने
मेरे सिर पर हाथ जमाया और बेशर्मी से बोला – “अपने रास्ते जाओ, रट्टू
पंछी वाले. ऐसा बेशर्म था! मैं उसे मार ही डालता, जेंटलमैन
की तरह, मगर आप खुद ही समझते हैं...”
“एले...”
तुर्बीन के शयनकक्ष से हल्की आवाज़ सुनाई दी. एलेना फ़ौरन मुडी और, पूरी बात
सुने बिना, उस तरफ भागी.
****
कैलेण्डर
के हिसाब से पंद्रह दिसंबर को सूरज दिन के साढ़े तीन बजे अस्त हो जाता है. इसलिए
क्वार्टर में तीन बजे से ही अन्धेरा होना शुरू हो गया था. मगर एलेना के चेहरे पर
दिन के तीन बजे सुईयां सबसे निचला और निराशाजनक समय – साढ़े पाँच दिखा रही थीं.
दोनों सुईयां मुँह के कोनों पर दयनीय झुर्रियां पार कर चुकी थीं, और नीचे
ठोढी की ओर खिंच रही थीं. उसकी आंखों में पीड़ा और दुर्भाग्य से जूझने का निश्चय
तैर रहा था.
निकोल्का
के चेहरे पर नुकीले और फूहड़ एक बजने में बीस मिनट दिखाई दे रहे थे, इस कारण से कि
निकोल्का के दिमाग में गडबडी और परेशानी थी, जो
महत्वपूर्ण और रहस्यमय शब्दों – “माला-प्रवाल्नाया...” के कारण
उत्पन्न हुई थी, उन शब्दों के कारण जिन्हें कल
युद्ध के चौराहे पर मरने वाले ने कहा था, उन
शब्दों के कारण, जिन्हें ज़्यादा दूर नहीं, बल्कि
अगले कुछ दिनों में ही समझाना ज़रूरी था. तुर्बीनों के जीवन में आसमान से टपके
रहस्यमय और दिलचस्प लरिओसिक के महत्वपूर्ण
आगमन से गड़बड़ी और कठिनाइयां उत्पन्न हो गई थीं, और उस
परिस्थिति के कारण भी कि शैतानी और महान घटना हुई थी:
पित्ल्यूरा
ने शहर पर कब्ज़ा कर लिया था. पित्ल्यूरा और, सोचिये! –
वही शहर. और अब वहाँ क्या होगा, इन्सानी
दिमाग की समझ से बाहर है, सबसे विकसित दिमाग के लिए भी
अगम्य और अनाकलनीय है. पूरी तरह स्पष्ट है कि कल एक घृणित विनाशकारी घटना घटित हुई
– हमारे सभी लोगों को मार डाला गया – अप्रत्याशित रूप से. उनका खून, निःसंदेह
पीड़ा से आसमान में चीख रहा है – ये है पहली बात. अपराधी – जनरल्स और स्टाफ
हेडक्वार्टर के कमीनों को मौत की सज़ा मिलनी चाहिए – ये हुई दूसरी बात. मगर, खौफ के
अलावा, ज्वलंत दिलचस्पी भी बढ़ रही है, - असल
में, होने क्या वाला है? सात लाख लोग
यहाँ, शहर में, रहेंगे कैसे - उस रहस्यमय व्यक्तित्व के नियंत्रण में, जिसका
इतना डरावना और बदसूरत नाम है – पित्ल्यूरा? वह है
कौन? किसलिए?...आह, वैसे, ये सब उस
सबसे महत्वपूर्ण, खूनी...एह...एह...सबसे भयानक चीज़, के मुकाबले में, मैं आपको
बताऊँगा, धुंधला हो जाएगा, असल में, सही-सही
कुछ भी पता नहीं है, मगर, काफी
संभव है कि मिश्लायेव्स्की और करास को मरा हुआ समझ लेना चाहिए.
चिकनी और
चिपचिपी मेज़ पर एक चौड़े चिमटे से निकोल्का बर्फ के टुकड़े काट रहा था. बर्फ के
टुकड़े या तो आवाज़ के साथ टूट जाते या चिमटे के नीचे से फिसल जाते और पूरे किचन में
उछलते, निकोल्का की उंगलियाँ सुन्न हो गईं थीं. चांदी के ढक्कन वाला एक जार पास ही
में रखा था.
“माला...प्रवाल्नाया...”
निकोल्का के होंठ हिल रहे थे, और उसके दिमाग में नाय-तुर्स की,
लाल बालों वाले नीरो की और मिश्लायेव्स्की की आकृतियाँ झाँक जातीं. और सिर्फ अंतिम
आकृति, कटे हुए ओवरकोट में, निकोल्का
के विचारों में कौंधी, गर्म स्टोव के पास व्यस्त दुखी और
परेशान अन्यूता का चेहरा स्पष्ट रूप से पाँच बजने में बीस मिनट दिखा रहा था –
उत्पीडन की और दर्दभरी घड़ी. क्या विभिन्न रंगों वाली आंखें सलामत हैं? क्या
खनखनाती एडों वाले दनदनाते कदम फिर से सुनाई देंगे – द्रेन्...द्रेन्...
“बर्फ लाओ,” किचन का
दरवाज़ा खोलते हुए एलेना ने कहा.
“अभ्भी, अभ्भी,”
निकोल्का ने जल्दी से जवाब दिया, ढक्कन बंद किया और भागा.
“अन्यूता, प्यारी,” एलेना
कहने लगी, “देख, किसी से
भी एक भी लब्ज़ न कहना कि अलेक्सेई वसील्येविच ज़ख़्मी हुआ है. अगर उन्हें पता चलेगा, खुदा
सलामत रखे, कि उनके खिलाफ लड़ रहा था तो मुसीबत
आ जायेगी.”
“मैं, एलेना
वसील्येव्ना, समझती हूँ. आप भी ना!” अन्यूता ने
परेशान, चौड़ी खुली आंखों से एलेना की और
देखा. “शहर में क्या हो रहा है, होली मदर! अभी, बरीचोव
तोक पर, मैं आ रही थी, दो लोग
पड़े थे बिना जूतों के...खून. खून!...चारों ओर लोग खड़े हैं, देख रहे
थे...कोई कह रहा था, कि दो अफसरों को मार डाला
है...वैसे ही पड़े हैं, सिरों पर टोपियाँ नहीं हैं...मेरे
कदम लड़खड़ा गए, भागी वहाँ से, हाथ से
टोकरी छूटते- छूटते बची...”
अन्यूता
ने सिहरते हुए कंधे उचकाये, और उसके हाथों से फ्रायिंग पैन्स
फिसल कर फर्श पर गिर गये...”धीरे, धीरे, खुदा के
लिए,” एलेना ने हाथ फैलाते हुए कहा.
लरिओसिक के चेहरे पर दिन के तीन बजे सुईयाँ सबसे उन्नत
और सशक्त स्थिति दिखा रही थीं – ठीक बारह. दोनों सुईयां दोपहर में एक दूसरे से मिल
गई थीं, और एक हो गईं थीं, तलवारों
की नोक की तरह. ऐसा इसलिए हुआ था, उस भयानक आपदा के बाद, जिसने
झितोमिर में लरिओसिक की कोमल आत्मा को
झकझोर दिया था, एम्बुलेन्स ट्रेन में ग्यारह
दिनों की भयानक यात्रा, और खतरनाक अनुभवों के पश्चात् लरिओसिक को तुर्बीनों के घर
में बहुत अच्छा लगा. किसलिए – ये तो लरिओसिक फिलहाल नहीं समझा सकता था, क्योंकि
उसे खुद को भी ठीक-ठाक पता नहीं था.
ख़ूबसूरत
एलेना असाधारण रूप से ध्यान आकर्षित करती थी और आदर की पात्र थी. और निकोल्का भी
बहुत अच्छा लगा. इसे दिखाने के लिए, लरिओसिक ने उस पल का लाभ उठाया, जब
निकोल्का ने अलेक्सेई के कमरे में आना-जाना रोक दिया, और वह
स्प्रिंग वाले संकरे पलंग को किताबों के कमरे में रखने और सरकाने में मदद करने
लगा.
“आपका
चेहरा बिल्कुल खुली किताब की तरह है, जो अपनी
ओर आकर्षित करता है,” उसने नम्रता से कहा और इस किताबी
चहरे में इतना खो गया कि उसका ध्यान ही नहीं गया कि कैसे उसने जटिल, खड़खड़ाते
पलंग को रखते समय निकोल्का के हाथ को दो पल्लों के बीच में दबा दिया. दर्द इतना
तेज़ उठा कि निकोल्का चीखने लगा, बेशक, दबी आवाज़
में, मगर इतना तेज़ कि एलेना सरसराहट से भागती हुई आई.
निकोल्का की आंखों से, जो पूरी ताकत से कोशिश कर रहा था
कि चीख न निकले, अपने आप बड़े-बड़े आंसू टपकने लगे.
एलेना और लरिओसिक स्वचालित पलंग से जूझते रहे और नीले पड़ गए हाथ को आज़ाद करने के
लिए बड़ी देर तक उसे विभिन्न दिशाओं में उसे
खोलने की कोशिश करते रहे. जब लाल धब्बों वाला आहत हाथ बाहर निकला, तो लरिओसिक
रोने-रोने को हो गया.
“माय
गॉड!” उसने अपने दयनीय चेहरे को और भी विकृत करते हुए कहा. “ये मेरे साथ हो क्या
रहा है?! मैं कितना अभागा हूँ!...आपको
बहुत दर्द हो रहा है? खुदा के लिए मुझे माफ़ कर दीजिये.”
निकोल्का
चुपचाप किचन की ओर लपका, और वहाँ अन्यूता ने उसके
आदेशानुसार, उसके हाथ पर नल से पानी की ठंडी
धार छोडी.
चालाक
पलंग के खटके के साथ खुलकर बिछ जाने के बाद, यह
स्पष्ट हो गया कि निकोल्का के हाथ को कोई ख़ास चोट नहीं पहुँची है, तब लरिओसिक
को किताबों के प्रति एक सुखद और शांत आनंद ने घेर लिया. पंछियों के शौक और उनके
प्रति प्यार के अलावा उसे किताबों का भी शौक था. यहाँ तो अनेक खानों वाली खुली
अलमारियों में एक दूसरे से सटे हुए खजाने रखे थे. काले फोल्डर्स पर हरे, लाल,
सुनहरे उभरे हुए शीर्षकों वाली, पीले आवरणों और काले फोल्डरों वाली किताबें चारों
दीवारों से लरिओसिक को देख रही थीं. पलंग कब का खुल चुका था और बिस्तर बिछ चुका था
और उसके पास एक कुर्सी, उसकी पीठ पर तौलिया टंगा था, और सीट
पर एक पुरुष के लिए आवश्यक वस्तुओं – साबुनदानी, सिगरेट, माचिस, घड़ी, के बीच
किसी महिला का रहस्यमय फोटो तिरछा रखा था, मगर लरिओसिक किताबों वाले कमरे में ही था, कभी
किताबें जडी दीवारों का सफ़र करते हुए, कभी
निचली कतारों के पास उकडूं बैठ जाता, हसरत भरी
निगाहों से जिल्द पर नज़र डालता, ये न समझ पाते हुए कि किस किताब
को फ़ौरन शुरू करे – “पिक्विक क्लब के मरणोपरांत नोट्स” या “रूसी बुलेटिन, 1871”. घड़ी की
सुईयां बारह पर खड़ी थीं. मगर घर में शाम के साथ-साथ उदासी भी बढ़ती गई. इसलिए घड़ी
बारह बार नहीं बजी, सुईयां खामोश खड़ी थीं और मातमी
झंडे में लिपटी चमकती तलवार जैसी लग रही थीं.
मातम की
वजह, सभी चेहरों की जीवन-घड़ियों में, जो तुर्बीनों की
पुरानी और धूल भरी आरामदेह ज़िंदगी से घनिष्ठता से जुड़े थे, विसंगति
का दोषी था एक पतला, पारे का स्तम्भ. तीन बजे तुर्बीन के
शयनकक्ष में वह दिखा रहा था 39.60. एलेना
पीली पड़ गई और उसे झटकने की कोशिश करने लगी, मगर तुर्बीन ने सिर घुमाकर, आंखों से
इशारा किया और कमजोरी से कहा: “दिखाओ”. एलेना ने चुपचाप और अनिच्छा से उसे
थर्मामीटर दिया. तुर्बीन ने नज़र डाली और भारी और गहरी सांस ली.
पाँच बजे
वह सिर पर ठंडी, भूरी थैली रखे लेटा था और थैली में बारीक बर्फ पिघल रही थी और बह
रही थी. उसका चेहरा गुलाबी हो गया, और आंखें
चमकने लगीं और बहुत सुन्दर हो गईं.
“उनचालीस
पॉइंट छ... अच्छा है,” बीच-बीच में अपने सूखे, फटे हुए
होठों पर जीभ फेरते हुए उसने कहा. “- तो -
ऐसा है...कुछ भी हो सकता है...मगर, हर हाल
में, प्रैक्टिस तो ख़त्म ही हो गई...हमेशा के लिए. कम से
कम हाथ तो बच जाए...वर्ना तो, मैं बिना हाथ के...”
“अल्योशा, चुप रहो, प्लीज़,” एलेना
ने उसके कन्धों पर कम्बल ठीक करते हुए विनती की...आंखें बंद करते हुए तुर्बीन चुप
हो गया. बाईं कांख में ऊपर हुए ज़ख्म से
शरीर में सूखी, चुभती हुई जलन फ़ैल रही थी. कभी
कभी वह पूरे सीने में भर जाती और सिर को धुंधला कर देती, मगर पैर अप्रिय रूप से
बर्फ जैसे हो गए थे. शाम तक, जब हर तरफ लैम्प जल गए और काफी पहले खामोशी और चिंता में तीनों – एलेना, निकोल्का
और लरिओसिक का डिनर हो चुका था, - पारे का स्तम्भ जादू के समान फूलते हुए और घने
चांदी के गोल से पैदा होते हुए बाहर रेंगते हुए 40.20 के निशान
तक पहुंच गया. तब गुलाबी शयनकक्ष में चिंता और उदासी अचानक पिघलने लगी और बाहर
बहने लगी. उदासी, कम्बल पर जमी एक भूरी गाँठ की तरह आई, और अब वह पीले धागों में
परिवर्तित हो गई, जो पानी में समुद्री शैवाल की तरह फ़ैल गई. प्रैक्टिस और भय के ख़याल, कि
क्या होगा, गुम हो गए, क्योंकि इस शैवाल ने सब कुछ धुंधला कर दिया था. सीने के बाएँ हिस्से में
ऊपर की ओर चीरता हुआ दर्द कुंद हो गया और सुस्त पड गया. बुखार का स्थान ठण्ड ने ले
लिया. सीने में जलती हुई मोमबत्ती कभी कभी बर्फीले चाकू में बदल जाती जो कहीं
फेफड़े में छेद कर रहा था. तब तुर्बीन सिर हिलाता और बर्फ की थैली फेंक कर कम्बल के
भीतर गहरे घुस जाता. ज़ख्म का दर्द नरम आवरण से बाहर आता और ऐसी पीड़ा देने लगता कि
ज़ख़्मी अनिच्छापूर्वक क्षीण और शुष्क शब्दों में शिकायत करता. जब चाकू गायब हो जाता
और उसका स्थान सुलगती जलन ले लेती, तब गर्मी शरीर को, चादरों को, कम्बल के नीचे सिकुड़ी हुई गुफा को नहला देती, और ज़ख़्मी कहता – “पानी” –
तो निकोल्का का, एलेना का, लरिओसिक का चेहरा धुंधलके में दिखाई देते, झुकते और सुनते. सबकी आंखें
खतरनाक रूप से एक जैसी हो गई थीं, व्यग्र और क्रोधित. निकोल्का की सुईयां अचानक खिंच गईं और, एलेना की भाँति
– ठीक साढ़े पाँच दिखाने लगीं. निकोल्का हर मिनट डाइनिंग रूम में जाता – इस शाम
रोशनी न जाने क्यों धुंधली और व्यग्रता से जल रही थी – और घड़ी पर
नज़र डालता. टोंक्र... टोंक्र...गुस्से से और चेतावनी-सी देते हुए घड़ी भर्राते हुए
चल रही थी, और उसकी सुईयां कभी नौ, कभी सवा
नौ, तो कभी साढ़े नौ दिखा रही थीं... “एख, एख,”
निकोल्का ने आह भरी और उनींदी मक्खी की तरह डाइनिंग रूम से, तुर्बीन के शयनकक्ष की
बगल से, लॉबी से होते हुए अतिथि कक्ष में
और वहाँ से अध्ययन कक्ष में और सफ़ेद परदे हटाकर, बाल्कनी के दरवाज़े से रास्ते पर
देख लेता... “कहीं डॉक्टर डर न गया हो...आये ही नहीं...” उसने सोचा. सड़क, खड़ी और
टेढ़ी-मेढ़ी, अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक
सुनसान थी, मगर फिर भी उतनी डरावनी नहीं थी. और कभी-कभार कुछ चरमराते हुए
स्लेज-गाड़ियाँ गुज़रतीं. मगर कभी-कभार...निकोल्का समझ रहा था, कि शायद
जाना पडेगा...और सोच रहा था कि एलेना को कैसे मनाये.
“अगर साढ़े
दस बजे तक वह नहीं आया, तो मैं खुद लरियोन लरिओनविच के
साथ जाऊंगी, और तुम अल्योशा के पास
रहोगे...चुप रहो, प्लीज़...समझने की कोशिश करो,
तुम्हारा डील डौल कैडेट्स जैसा है...और लरिओसिक को अल्योशा की सिविल ड्रेस दे देंगे...और महिला
के साथ उसे कोई नहीं छुएगा....”
लरिओसिक गड़बड़ करने लगा, उसने
खतरा मोल लेने और अकेले ही जाने की तैयारी दर्शाई और वह सिविलियन ड्रेस पहनने चला
गया.
चाकू पूरी
तरह ग़ायब हो गया, मगर बुखार तेज़ हो गया – टाइफ़ाइड भट्टी
को भी मात दे रहा था, और बुखार में कई बार एक अस्पष्ट
और तुर्बीन के लिए पूरी तरह अपरिचित व्यक्ति की आकृति आई. वह भूरी पोशाक में थी.
“तुम्हें
पता है, उसने, शायद, कुलांटी
मारी थी? भूरा?” तुर्बीन
ने अचानक स्पष्ट और कठोरता से कहा और उसने एलेना को गौर से देखा.
“यह
अप्रिय है...वैसे, असल में, सभी पंछी. गर्म कमरे में
ले जाकर, गर्माहट में रखना चाहिए और गर्मी में उनके होश ठिकाने आ जाते.”
“तुम क्या
कह रहे हो, अल्योशा?” एलेना
ने डरते हुए पूछा, झुकते हुए उसे महसूस हो रहा था कि
उसके चेहरे पर तुर्बीन के चेहरे से गर्म लपटें आ रही हैं. “पंछी? कौनसा
पंछी?”
काली
सिविलियन ड्रेस में लरिओसिक कुबड़ा, चौड़ा नज़र
आने लगा, पीले जूते पतलून के नीचे छुप गए
थे. वह डर गया था, उसकी आंखें दयनीयता से घूम रही
थीं. पंजों के बल, संतुलन बनाते हुए, वह
शयनकक्ष से, प्रवेश कक्ष से होते हुए डाइनिंग रूम में, किताबों
वाले कमरे से निकोल्का के कमरे में मुड़ा और वहाँ, कठोरता
से हाथ हिलाते हुए, लिखने की मेज़ पर रखे पिंजरे की
तरफ़ लपका और उस पर काला कपड़ा डाल दिया...मगर यह अनावश्यक था – पंछी कब का कोने में
सो चुका था, पंखों का गोल बनाकर, किसी भी तरह की परेशानी से बेखबर.
लरिओसिक ने किताबों के कमरे का दरवाज़ा और किताबों के कमरे से डाइनिंग रूम वाला
पक्का बंद कर दिया.
“अप्रिय...ओह, अप्रिय,”
तुर्बिन ने कोने की ओर देखते हुए बेचैनी से कहा, “बेकार
ही में मैंने उसे गोली मार दी...तुम सुनो...” वह कम्बल के नीचे से अपना तंदुरुस्त
हाथ बाहर निकालने लगा... “सबसे अच्छा तरीका है बुलाने और समझाने का, क्यों, बेकार ही
में, इधर-उधर भाग रहे हो?... मैं , बेशक, इसकी ज़िम्मेदारी
लेता हूँ...सब ख़त्म हो गया और बेवकूफी से...”
“हाँ, हाँ,”
निकोल्का ने बोझिलपन से कहा, और एलेना ने सिर झुका लिया.
तुर्बीन उत्तेजित हो गया, उठने की कोशिश करने लगा, मगर
चुभता हुआ दर्द उठा, वह कराहा, फिर
कड़वाहट से बोला:
“तो फिर
भाग जाओ!...”
“शायद,
उसे किचन में ले जाना बेहतर होगा? वैसे, मैंने
उसे ढांक दिया है, वह खामोश है,” लरिओसिक
ने परेशानी से पूछा.
एलेना ने
हाथ हिला दिया: “नहीं, नहीं, ये बात
नहीं है...” निकोल्का निर्णायक कदमों से डाइनिंग रूम में आया. उसके बाल बिखरे हुए
थे, उसने डायल की और देखा: घड़ी क़रीब दस दिखा रही थी. चिंतित अन्यूता डाइनिंग रूम
के दरवाज़े से बाहर आई.
“क्या, कैसे हैं
अलेक्सेई वसील्येविच?” उसने पूछा.
“बड़बड़ा
रहा है,” गहरी सांस लेते हुए निकोल्का ने
जवाब दिया.
“आह, मेरे
खुदा,” अन्यूता फुसफुसाई, “ये डॉक्टर क्यों नहीं आ रहा है?”
निकोल्का
ने उसकी तरफ़ देखा और शयनकक्ष में वापस आया. वह एलेना के कान के पास झुका और उसे
मनाने लगा:
“मर्ज़ी
तुम्हारी, मगर मैं डॉक्टर को बुलाने जा रहा
हूँ. अगर वह नहीं है, तो दूसरे को बुलाना होगा. दस बजे
हैं. रास्ते पर पूरी खामोशी है.”
“साढ़े दस
तक इंतज़ार करेंगे,” सिर हिलाते हुए और रूमाल में हाथ
घुसाते हुए एलेना ने फुसफुसाहट से जवाब दिया, “किसी और को बुलाना अच्छा नहीं होगा.
मुझे मालूम है, ये वाला आयेगा.”
दस बजते
ही एक भारी, बौड़म और मोटी तोप छोटे से शयन
कक्ष में घुस गई. शैतान जाने क्यों! बिल्कुल बेमतलब रहेगी. उसने दोनों दीवारों के
बीच सारी जगह घेर ली, इस तरह कि बायाँ पहिया बिस्तर से टिक रहा था. असंभव है रहना. भारी-भारी
छड़ों के बीच से गुज़रना होगा, फिर कमान की तरह झुकना होगा और दूसरे, दायें पहिये से सिकुड़कर, और चीज़ों के
साथ, और चीज़ें तो खुदा जाने कितनी लटकी हैं
बाएं हाथ पर. ज़मीन की ओर हाथ खींचती हैं, रस्सी से बगल
को काटती हैं. तोप को हटाना असंभव है, पूरा क्वार्टर
तोप बन गया है, आदेश के अनुसार, और बेवकूफ़
कर्नल मालिशेव, और पगला गई एलेना, पहियों के बीच से झांकती हुई, कुछ भी नहीं कर सकते, ताकि या तो तोप को बाहर निकाल दें, या कम से कम, बीमार इंसान को ही दूसरी, जीने लायक परिस्थितियों में ले जाएँ, वहाँ, जहाँ कोई तोपें
न हों. इस नासपीटी, भारी-भरकम और ठंडी चीज़ के कारण पूरा क्वार्टर ही सराय जैसा बन
गया है. दरवाज़े की घंटी बार-बार बजती है...ब्रिन्...और लोग आने लगे. कर्नल मालिशेव
दिखाई दिया,बौड़म, बंजारे जैसा,कानदार टोपी और सुनहरे शोल्डर
स्ट्रैप्स में, और अपने साथ कागज़ात का ढेर खींचता
हुए. तुर्बीन उसके ऊपर चिल्लाया, और मालिशेव तोप की नाली में घुस गया और निकोल्का
में बदल गया, परेशान,नासमझ, बेवकूफ
और जिद्दी. निकोल्का ने पीने के लिए पानी दिया, मगर ठंडा, झरने से निकल रहे पानी
जैसा नहीं, बल्कि गरम, घिनौना पानी, जिसमें सॉस पैन की बू आ
रही थी.
“फू...ये
घिनौनी...रोको,” तुर्बीन बड़बड़ाया.
निकोल्का घबरा
भी गया और उसने भौंहे भी चढ़ा लीं, मगर वह जिद्दी
और फूहड़ था. एलेना कई बार काले और अनावश्यक लरिओसिक, सिर्योझा के भतीजे में बदलती
रही, और फिर से लाल बालों वाली एलेना के
रूप में वापस आती रही, माथे के पास
उँगलियाँ घुमाती रही, और इससे बहुत
कम आराम मिल रहा था. एलेना के हाथ, जो आम तौर से
गर्माहट भरे और फुर्तीले हैं, इस समय पांचे
की तरह लम्बे-लम्बे और बेवकूफी से घूम रहे थे और सब कुछ अनावश्यक, चिड़चिड़ाहटभरा कर रहे थे, जो शापित वर्कशॉप के आँगन में किसी
शांतिप्रिय आदमी के जीवन में ज़हर घोल देता है. यह संभव नहीं लगता कि एलेना ही उस
डंडे का कारण थी, जिस पर गोली से ज़ख़्मी हुए तुर्बीन का
जिस्म रखा गया था. और ऊपर से बैठी रही...हुआ क्या था उसे?...इस डंडे के अंतिम सिरे पर, और वह
वज़न से धीरे-धीरे गोल घूमने लगा, जी मिचलाने
तक...ज़रा ज़िंदा रहने की कोशिश तो करो, यदि गोल डंडा शरीर में घुस रहा हो! नहीं, नहीं, नहीं, बर्दाश्त से बाहर है! और जितनी ज़ोर से
हो सके, मगर आवाज़ धीमी ही निकली, तुर्बीन ने आवाज़ दी:
“यूलिया!”
यूलिया, हाँलाकि,चालीस के दशक के सुनहरे स्ट्रैप्स की
तस्वीर वाले प्राचीन कमरे से बाहर नहीं निकली, उसने बीमार
व्यक्ति की पुकार का जवाब नहीं दिया. और बेचारे बीमार व्यक्ति को भूरी आकृतियाँ
पूरी तरह बेज़ार कर देतीं, जो क्वार्टर और
शयनकक्ष में तुर्बीनों के साथ-साथ घूमने लगी थीं, यदि मोटा, सुनहरे चश्मे वाला - जिद्दी और काबिल
व्यक्ति न आया होता. उसके सम्मान में छोटे से शयनकक्ष में प्राचीन, भारी, काले मोमबत्तीदान
में एक और रोशनी आ गई – स्टीअरिन की फड़फड़ाती हुई रोशनी. मोमबत्ती कभी मेज़ पर
टिमटिमाती, तो कभी तुर्बीन के चारों ओर घूमती, और उसके ऊपर दीवार पर चलता डरावना
लरिओसिक, पंख कटे चमगादड़ की तरह. मोमबत्ती झुक
रही थी, सफ़ेद स्टीअरीन के साथ पिघलती हुई.
छोटा सा शयनकक्ष आयोडीन और ईथर की असहनीय गंध से भरा था. निकलप्लेटेड आईनों में मेज़
पर पड़े चमकीले डिब्बों, लैम्पों और थियेटर की रूई – क्रिसमस की बर्फ के
प्रतिबिम्बों का हंगामा हो रहा था. मोटे, सुनहरे आदमी ने
गर्माहट भरे हाथों से तुर्बीन को उसके तंदुरुस्त हाथ में आश्चर्यजनक इंजेक्शन
दिया, और कुछ मिनट बाद भूरी आकृतियों ने बदतमीजी करना बंद कर दिया. तोप को बाहर
बरामदे में सरका दिया गया, जिससे परदे लगी
खिड़कियों से उसकी काली नली बिल्कुल भी भयानक नहीं प्रतीत हो रही थी. आराम से सांस
लेना संभव हो गया था, क्योंकि
भारी-भरकम पहिया चला गया था और छड़ों के बीच से रेंगने की ज़रुरत नहीं थी. मोमबत्ती
बुझ गई, और नुकीला, कोयले जैसा काला,झितोमिर से आया हुआ लरिओसिक
सुर्झान्स्की लुप्त हो गया, और निकोल्का का
चेहरा ज़्यादा संजीदा हो गया, वैसा चिड़चिड़ा,
जिद्दी नहीं रहा, हो सकता है, इसलिए कि सुनहरे, मोटे के कौशल पर उम्मीद की बदौलत, घड़ी की सुईयां अलग हो गईं और अब वे इतने
जिद्दीपन और परेशानी से नुकीली ठोढ़ी पर नहीं टंगी थी. पीछे की ओर साढ़े पाँच से बीस मिनट कम
पाँच बजे के बीच काफी समय बीत गया था और डाइनिंग रूम की घड़ी इससे सहमत नहीं थी, जिद्दीपन से अपनी सुईयों को आगे, और आगे भेजती जा रही थी, मगर अब वह बूढ़ी भर्राहट और भिनभिनाहट
के बगैर और पहले की तरह – साफ़, दमदार आवाज़ से
बजा रही थीं – टोंक! और टॉवर जैसे घंटे से, जैसे खिलौने
वाले ल्युद्विक XIV के किले के टॉवर में बजा रही थीं
- बोम्!...आधी रात..सुनो...आधी
रात...सुनो...चेतावनी-सी देते हुए बज रही थी, और किसी के
फरसे चांदी जैसी और प्यारी खनखनाहट पैदा कर रहे थे. संतरी आगे-पीछे घूम रहे थे और
सुरक्षा कर रहे थे, क्योंकि टॉवर्स, अलार्म्स और हथियारों
का निर्माण मनुष्य ने, खुद ही जाने
बिना – सिर्फ एक ही उद्देश्य के लिए किया है – मानव की शान्ति और भट्टी की सुरक्षा
के लिए. इसी की रक्षा करने के लिए वह युद्ध करता है, और, सच कहें तो, किसी और उद्देश्य के लिए किसी भी हालत
में युद्ध करने की ज़रुरत नहीं है.
सिर्फ शान्ति की
परिस्थिति में ही यूलिया, वह स्वाभिमानी, पापी, मगर लुभावनी
औरत प्रकट होने के लिए राजी होती है. और वह प्रकट भी हुई, ईंटों की सीढ़ियों पर काली स्टॉकिंग
में उसके पैर, काली मखमल जड़े जूते के कोने की झलक
दिखाई दी,और उसके कदमों की जल्दबाज़ खटखटाहट और
पोषाक की सरसराहट का जवाब नन्ही घंटियों के संगीत ने वहाँ से दिया, जहाँ, अपनी शोहरत और
रंग-बिरंगी आकर्षक महिलाओं की उपस्थिति में मदमस्त ल्युद्विक XIV
झील के किनारे आसमानी-नीले बाग़ में दमक रहा था.
****
आधी रात को
निकोल्का ने सबसे महत्वपूर्ण और, बेशक, बिल्कुल सही वक्त पर काम शुरू किया. सबसे
पहले वह किचन से एक गंदा गीला कपड़ा लाया, और डच भट्टी के सीने से ये शब्द लुप्त हो
गए:
“रूस अमर
रहे...
सम्राट
अमर रहे!
पित्ल्यूरा
को मारो!”
इसके बाद
लरिओसिक के सक्रिय सहयोग से अन्य महत्वपूर्ण काम भी किये गए. तुर्बीन की लिखने की
मेज़ से हौले से और चुपचाप अल्योशा की ब्राउनिंग, दो मैग्ज़ीन्स, और
कारतूसों का डिब्बा बाहर निकाले गए. निकोल्का ने उसका निरीक्षण किया और देखा कि
बड़े भाई ने सात में से छः गोलियां कहीं चला दी थीं.
“शाबाश...”
निकोल्का बुदबुदाया.
बेशक, लरिओसिक
के विश्वासघात करने का सवाल ही नहीं उठता. एक बुद्धिजीवी व्यक्ति, और एक जेन्टलमैन
जिसने पचहत्तर हज़ार के प्रोमिसरी नोट पर हस्ताक्षर किये हों, और
त्रेसठ शब्दों के टेलीग्राम भेजा हो, किसी भी
हालत में पित्ल्यूरा के पक्ष में नहीं हो सकता. ऑटोमोबाइल ऑइल और केरोसिन से नाय
तुर्स के ऑटोमेटिक पिस्तौल और अल्योशा की ब्राउनिंग को साफ़ किया गया. और लरिओसिक
ने भी, निकोल्का की ही तरह आस्तीनें चढ़ाकर ग्रीज़ लगाने और उन्हें केक के एक लम्बे
और ऊंचे टीन के डिब्बे में रखने में मदद की. काम शीघ्रता से हो रहा था, क्योंकि
हर शरीफ़ आदमी, जिसने क्रान्ति में भाग लिया हो, अच्छी
तरह जानता है कि हर शासन में तलाशी सर्दियों में रात के ढाई बजे से सुबह छः बजे तक
और गर्मियों में रात के बारह बजे से सुबह चार बजे तक होती है. फिर भी काम में देर
हो ही गई, लरिओसिक की वजह से, जिसने दस
राउंड सिस्टम कोल्ट का निरीक्षण करते हुए मैगज़ीन को गलत सिरे से रख दिया, और, उसे
बाहर खींचने में काफ़ी कोशिश और काफ़ी तेल की ज़रुरत पडी. इसके अलावा, एक और भी
अप्रत्याशित बाधा आई: डिब्बा उसमें रखे हुए रिवाल्वरों, अलेक्सेई
और निकोल्का के शोल्डर स्ट्रैप्स, रैंक्स
वाले बैज और त्सारेविच की तस्वीर के कारण, जिसमें अन्दर पैरेफिन पेपर की तह बिछाई
गई थी और बाहर से सभी सिलाइयों पर विद्युत् रोधी चिपचिपी पट्टियां लगी हुई थीं, खिड़की
में घुस ही नहीं रहा था.
बात ये थी
: छुपाना है, मतलब छुपाना है !...सभी ऐसे
बेवकूफ़ नहीं होते जैसा वसिलीसा है. कैसे छुपाना है, इस बारे
में निकोल्का ने दिन में ही सोच लिया था. मकान नं. 13 की दीवार पड़ोस वाले नं.11 की
दीवार को लगभग छूती थी – उनके बीच दो फीट से अधिक दूरी नहीं थी. इस दीवार में मकान
नं. 13 की सिर्फ तीन खिड़कियाँ थीं – एक निकोल्का के कोने वाले कमरे की, दो पड़ोस
वाले किताबों के कमरे की, जो बिल्कुल अनावश्यक थी (हमेशा
अन्धेरा ही रहता था), और नीचे की तरफ छोटी-सी जाली लगी धुंधली खिड़की थी, जो वसिलीसा
के तहखाने में थी, और पड़ोस वाले नं.11 की दीवार पूरी
तरह बंद है. एक दो फुट गहरी शानदार घाटी की कल्पना कीजिये, अंधेरी, जो
रास्ते से भी दिखाई न दे और जहाँ तक कम्पाउंड से कोई भी नहीं पहुँच सकता, सिवाय कभी
कभार आये छोटे बच्चों के. वैसे, बचपन में ‘चोर-सिपाही’ का खेल
खेलते हुए, निकोल्का ईंटों के ढेरों से टकराते
हुए उस पर चढ़ जाया करता था, और उसे अच्छी तरह याद है, कि तेरह
नंबर वाली दीवार पर खूंटियों की कतार छत तक पहुँचती है. शायद, पहले, जब ग्यारह
नंबर का अस्तित्व नहीं था, इन खूंटियों पर अग्नि शामक दल की सीढ़ी
टिकी रहती थी, मगर बाद में उसे हटा दिया गया.
खूंटियाँ रह गईं.
आज शाम को
वेंटिलेटर से हाथ बाहर निकालने पर, निकोल्का
ने दो सेकण्ड भी नहीं टटोला होगा, कि उसे खूंटी का अनुभव हुआ. सीधा
और साफ़ है. मगर ये डिब्बा, जिसे तिहरी मज़बूत डोरी से बांधा
गया था, और जिस पर फंदा भी बनाया गया था,
वेंटिलेटर में घुस ही नहीं रहा था.
“बिलकुल साफ़ बात है, खिड़की को खोलना पडेगा,” निकोल्का
ने वेंटिलेटर से नीचे उतरते हुए कहा.
लरिओसिक
ने निकोल्का की बुद्धि और चतुराई को सलाम किया, इसके बाद
खिड़की को खोलने के काम में जुट गया. यह कठिन काम कम से कम आधा घंटा चला, फूली हुई
चौखट खुलने को तैयार नहीं थी. मगर आखिरकार, पहले एक
और फिर दूसरे पल्ले को खोलना संभव हो गया, इसमें
लरिओसिक की तरफ के कांच पर लम्बी, टेढ़ी-मेढ़ी दरार पड़ गई.
“बत्ती
बुझा दो!” निकोल्का ने हुक्म दिया.
बत्ती बुझ
गई, और बेहद भयानक बर्फीली हवा कमरे में घुस आई.
निकोल्का ने काले, बर्फ बन चुके अंतराल में अपना आधा
शरीर बाहर निकाला और ऊपरी फंदे को खूंटी में फंसा दिया. डिब्बा आराम से दो फुट
लम्बी डोरी से लटक रहा था. रास्ते से उसे देखना संभव नहीं था, क्योंकि 13
नंबर की अग्निरोधक दीवार सड़क की ओर तिरछी जाती है, न की समकोण बनाते हुए, और
इसलिए, कि सिलाई वाले वर्कशॉप का बोर्ड ऊंचाई पर टंगा है. इसे तभी देखा जा सकता है, जब कोई
दरार में घुसे. मगर बसंत से पहले कोई नहीं चढ़ेगा, क्योंकि
कंपाऊंड से यहाँ तक बर्फ के ऊंचे-ऊँचे ढेर थे, और सड़क की
तरफ़ से बेहद ख़ूबसूरत बागड़ थी, और, सबसे महत्वपूर्ण, बढ़िया बात ये थी कि डिब्बे को
बिना खिड़की खोले नियंत्रित किया जा सकता था; बस,
वेंटिलेटर से हाथ बाहर निकालो, और बस, तैयार :
डोरी को छुआ जा सकता था, तार की तरह. बढ़िया.
बत्ती फिर
से जलने लगी, और, खिड़की की
सिल पर पुट्टी सानने के बाद, जो अन्यूता के पास पतझड़ से पड़ी थी, निकोल्का
ने फिर से खिड़की पर पुट्टी फेर दी. अगर खुदा-ना-खास्ता देख भी लिया, तो फ़ौरन
जवाब तैयार है : “माफ़ कीजिये? ये किसका डिब्बा है? आह,
रिवॉल्वर्स...त्सारेविच?
“ऐसी कोई
बात नहीं! हमने तो कुछ देखा नहीं, और हम कुछ जानते नहीं. शैतान जाने
कौन लटका गया! छत से चढ़े और टांग दिया. आसपास क्या कम लोग हैं? तो...हम
तो शांतिप्रिय लोग हैं, किसी त्सारेविच से हमें मतलब नहीं...”
“बड़ी
होशियारी से किया गया है, खुदा कसम,” लरिओसिक
ने कहा.
बढ़िया
कैसे न होता! चीज़ हाथ में है और साथ ही क्वार्टर के बाहर भी.
****
रात के तीन
बजे थे. ज़ाहिर है, इस रात कोई नहीं आयेगा. एलेना
भारी, थकी हुई पलकों से पंजों के बल डाइनिंग रूम में आई.
निकोल्का को उसके बदले बैठना था. निकोल्का, तीन से
छः बजे तक, और छः बजे से नौ बजे तक लरिओसिक.
फुसफुसाहट
में बात करते रहे.
“मतलब : टायफाइड”,
एलेना फुसफुसाई, “इस बात का ध्यान रखना कि आज
वान्दा आकर गई है, पूछ रही थी कि अलेक्सेई वसिल्येविच को क्या हुआ है. मैंने कहा, हो सकता
है, टायफाइड हो...शायद उसने यकीन नहीं किया, उसकी आंखें
इधर-उधर भाग रही थीं...सब कुछ पूछती रही, - हम कैसे हैं, हमारे
लोग कहाँ थे, कोई ज़ख़्मी तो नहीं हुआ. घाव के
बारे में एक भी लब्ज़ नहीं.
“ना, ना, ना ,”
निकोल्का ने हाथ हिलाते हुए कहा. वसिलीसा इतना डरपोक है, जैसा
दुनिया में अब तक कोई नहीं हुआ! अगर कुछ हो जाता है, तो वह हर
किसी से कहता फिरेगा, कि अलेक्सेई ज़ख़्मी हुआ है, सिर्फ
अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए.”
“कमीना,”
लरिओसिक ने कहा, “ये नीचता है!”
तुर्बीन
पूरी धुंध में लेटा था. इंजेक्शन के बाद उसका चेहरा एकदम शांत था, चेहरे के
नाक नक्ष नुकीले और पैने हो गए थे. एक शामक ज़हर खून में बह रहा था और मानो पहरा दे
रहा था. भूरी आकृतियों ने मनमाने ढंग से हुक्म चलाना बंद कर दिया था, और वे अपने
अपने काम पर चली गई थीं, आखिरकार तोप को हटा दिया गया. अगर कोई एकदम अनजान व्यक्ति
भी आता, तो शराफ़त से बर्ताव करता, उन लोगों
से और चीज़ों से जुड़ने की कोशिश करता, जो
कानूनन तुर्बीनों के क्वार्टर में मौजूद रहती हैं. एक बार कर्नल मालिशेव आया, कुर्सी में बैठा, मगर इस
तरह से मुस्कुरा रहा था, कि सब ठीक है और बेहतर ही होगा, और वह
धमकाते हुए और कड़वाहट से नहीं बुदबुदाया, और न ही उसने
कमरे को कागज़ात से भर दिया. ये सही है, कि उसने
कागज़ात जला दिए, मगर उसने तुर्बीन के डिप्लोमा-सर्टिफिकेट,
और माँ की फ़ोटो को छूने की हिम्मत नहीं की, और स्प्रिट की प्यारी और पूरी नीली लौ
पर जलाता रहा, और ये लौ सुकून देने वाली है, क्योंकि
उसके बाद, अक्सर, इंजेक्शन लगाया जाता है.
मैडम अंजू की घंटी अक्सर बजती रही.
“ब्रिन्....”
तुर्बीन घंटी की आवाज़ के बारे में उससे मुखातिब हुआ जो कुर्सी पर बैठा था, और वे
बारी बारी से बैठते थे, कभी निकोल्का, कभी
अनजाना आदमी, किसी मंगोल जैसी आंखों वाला
(इंजेक्शन के प्रभाव के कारण हाथापाई करने का साहस नहीं था), या उदास मक्सिम, सफ़ेद
बालों वाला, थरथराता हुआ. “ब्रिन्...” ज़ख़्मी
प्यार से बोल रहा था और लचीली परछाइयों से चलती-फिरती तस्वीर बनाने की कोशिश कर
रहा था, दर्दभरी और कठिन, मगर जो
असाधारण और प्रसन्न और बीमार अंत की ओर बढ़ रही थी.
घड़ी भाग
रही थी, डाइनिंग होल में सुई घूम रही थी और, जब सफ़ेद
डायल पर छोटी और बड़ी सुई पाँच की तरफ चली तो अर्धमूर्छा की स्थिति आ गई. तुर्बीन
कभी-कभी हिलता, सिकोड़ी हुई आंखें खोलता और
अस्पष्ट रूप से बड़बड़ाता :
“सीढ़ी पर,
सीढ़ी पर, सीढ़ी पर नहीं भाग पाऊँगा, कमज़ोरी
महसूस कर रहा हूँ, गिर जाऊंगा...और उसकी पाँव तेज़
हैं...जूते...बर्फ पर...निशान छोड़ेंगे ...भेडिये...ब्रिन्...ब्रिन्...”
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