Wednesday, 2 November 2022

शैतानियत - ०३

 

 

 

१.३.  गंजा प्रकट हुआ


अगली सुबह करत्कोव ने, पट्टी सरका कर, ये इत्मीनान कर लिया कि उसकी आंख करीब-करीब ठीक हो गई है. फिर भी अति सतर्क करत्कोव ने फिलहाल बैंडेज न हटाने का फैसला किया.

काम पर काफी देर से आने के बाद, चालाक करत्कोव, निचले कर्मचारियों को कोई गलत निष्कर्ष निकालने पर उत्साहित न करने के उद्देश्य से सीधे अपने कमरे में गया और उसने मेज़ पर एक ‘नोट’ देखा, जिसमें कर्मचारी- उपविभाग के प्रमुख ने ‘आधार के प्रमुख से पूछा था – क्या टाइपिस्टों को यूनिफॉर्म्स दिए जाएंगे. ‘नोट को दाईं आंख से पढ़ने के बाद, करत्कोव ने उसे उठाया और कॉरीडोर से होते हुए ‘आधार प्रमुख कॉमरेड चिकूशिन के कमरे की ओर चल पडा.           

 और चिकूशिन के कमरे के ठीक दरवाज़े के पास वह एक अजनबी से टकराया, जिसने अपनी आकृति से उसे चौंका दिया.

इस अजनबी का कद इतना छोटा था, कि वह ऊंचे करत्कोव की सिर्फ कमर तक पहुंच रहा था. ऊंचाई की कमी को अजनबी के अत्यधिक चौड़े कंधे पूरा कर रहे थे.  चौड़ा धड मुडी हुई टांगों पर स्थित था, बाईं टांग लंगडाती थी. मगर सबसे लाजवाब था उसका सिर. वह बिलकुल किसी विशाल अंडे के मॉडल जैसा था, जिसे गर्दन पर आड़ा रखा था, नुकीले सिरा सामने की और था. वह अन्डे जैसा ही गंजा था और इतना चमकदार था, कि अजनबी की खोपड़ी पर बिना बुझे बिजली के बल्ब जलते रहते. अजनबी के छोटे से चेहरे की इतनी घिस-घिस के हजामत की गई थी कि वह नीला नज़र आ रहा था, और पिन के सिरों जैसी छोटी-छोटी, हरी आंखें गहरे गढ़ों में बैठी थीं. अजनबी के बदन पर भूरे रंग के कंबल से बना हुआ एक खुला जैकेट था, जिसके नीचे से ‘छोटे रूस की कढाई की हुई कमीज़ झाँक रही थी. पैर उसी कपडे की पतलून में थे और उसने अलेक्सांद्र I के ज़माने के हुस्सार जैसे नीचे-जूते पहने थे.

“न-नमूना”, करत्कोव ने सोचा और गंजे से बचने की कोशिश करते हुए चिकूशिन के दरवाज़े की ओर लपका. मगर उसने पूरी तरह अप्रत्याशित रूप से करत्कोव का रास्ता रोक लिया.

“आपको क्या चाहिए?” गंजे ने करत्कोव से ऐसी आवाज़ में पूछा कि बेचारा नर्वस क्लर्क सहम गया. ये आवाज़ एकदम ताम्बे के तसले की आवाज़ जैसी थी और उसका लहजा इतना ख़ास था, कि जो भी उसे सुनता उसे यूँ महसूस होता कि हर लब्ज़ के साथ रीढ़ की हड्डी पर कोई खुरदुरा तार घूम रहा हो. इसके अलावा, करत्कोव को ऐसा लगा जैसे अजनबी के शब्दों से दियासलाइयों की गंध आ रही है.

इस सबके बावजूद, अदूरदर्शी करत्कोव ने वह कर दिया, जिसे किसी भी हाल में नहीं करना चाहिए था, - वह बुरा मान गया.

“हुम् ...अजीब बात है. मैं कागज़ लेकर जा रहा हूँ...और मेहेरबानी करके यह जानने की इजाज़त दीजिये, कि आप कौ...”

“और, क्या आप देख नहीं रहे हैं, कि दरवाज़े पर क्या लिखा है?

करत्कोव ने दरवाज़े को देखा और चिर-परिचित इबारत को देखा:

बिना रिपोर्ट के भीतर न जाएँ”.

“ मैं रिपोर्ट के साथ ही जा रहा हूँ,” करत्कोव ने अपने कागज़ की ओर इशारा करते हुए कहा.

चोकौर गंजा अचानक गुस्सा हो गया. उसकी आंखों से पीली चिनगारियाँ फूटने लगीं.

“आप, कॉम्रेड,” उसने करत्कोव को बर्तनों की आवाजों से बहरा करते हुए कहा, “ इतने नासमझ हैं, कि सीधे-सादे सरकारी लब्जों का मतलब भी नहीं समझते. मुझे तो ताज्जुब होता है, कि आपने अब तक कैसे काम किया है. 

वैसे, आपके यहाँ काफी दिलचस्प चीज़ें हैं, मिसाल के तौर पर, हर कदम पर ये मार खाई आंखें. खैर, कोई बात नहीं, ये सब हम ठीक कर लेंगे. (“आ-आ!” करत्कोव ने खामोशी से आह भरी.)

इधर दीजिये!”

और इन शब्दों के साथ अजनबी ने करत्कोव के हाथों से कागज़ छीन लिया, उसे फ़ौरन पढ़ लिया, पतलून की जेब से एक चबाई हुई केमिकल पेन्सिल (रासायनिक पेन्सिल – अनु.) निकाली, कागज़ को दीवार से चिपकाया और कुछ शब्द घसीटे.

“जाइए!” वह भौंका और उसने कागज़ इस तरह करत्कोव पर गड़ाया कि उसकी बची हुई आंख भी बाहर निकलते-निकलते बची. कमरे का दरवाज़ा विलाप कर उठा और उसने अजनबी को निगल लिया, मगर करत्कोव भौंचक्का रह गया, - कमरे में चिकूशिन नहीं था.

आधे मिनट बाद परेशान करत्कोव होश में आया, जब कॉम्रेड चिकूशिन की पर्सनल सेक्रेटरी, लीदच्का द रूनी से टकराया.

“आ-आह!” करत्कोव चिल्लाया. लीदच्का की आंख भी बिलकुल वैसी पट्टी से बंधी थी, फर्क सिर्फ इतना था कि बैंडेज के सिरे एक फैशनेबल रिबन से बंधे हुए थे.

“आपके यहाँ ये क्या हो रहा है?

“दियासलाइयां!” लीदच्का ने चिडचिड़ाहट से जवाब दिया. “नासपीटी.”

“वहाँ वो कौन है?” आहत करत्कोव ने फुसफुसाहट से पूछा.

“क्या आपको मालूम नहीं है?” लीदच्का फुसफुसाई. “नया.”

“क्या?” करत्कोव की सीटी निकल गई, “और चिकूशिन?

“उसे कल भगा दिया,” लीदच्का ने कटुता से कहा और कमरे की और इशारा करते हुए आगे बोली: “ बत्तख, कहीं का. ये है नमूना. इतना घिनौना इंसान मैनें ज़िंदगी में आज तक नहीं देखा. चिल्लाता है! नौकरी से निकाल दूँगा!...गंजी अंडरपैन्ट!” उसने अचानक आगे जोड़ा, जिससे करत्कोव ने आंख निकालते हुए उसकी ओर देखा.

“क्या ना...”

करत्कोव पूछ ही नहीं पाया. दरवाज़े के पीछे भयानक आवाज़ गरजी:

“कुरियर!” क्लर्क और सेक्रेटरी फ़ौरन विभिन्न दिशाओं में उड़े. अपने कमरे में आने के बाद करत्कोव अपनी मेज़ पर बैठ गया और अपने आप से बोला:

“आय,याय,याय...तो, करत्कोव, तू तो गया काम से. इस हादसे को सुधारना होगा.....”जंगली”...हुम्बदमाश...ठीक है! तू देख ही लेना कि ये करत्कोव कैसा जंगली है.”

और एक आंख से क्लर्क ने गंजे की लिखी टिप्पणी पढ़ ली. कागज़ पर तिरछे अक्षरों में लिखा था:

सभी टाइपिस्ट लड़कियों और सभी महिलाओं को समयानुसार दी जायेंगी सैनिकों वाली अन्डरपैन्ट्स* ” (*यहाँ ‘कल्सोनी’ लिखा है – जिसका अर्थ होता है अन्डरपैन्ट्स- अनु.)

“ये हुई ना बढ़िया बात!” करत्कोव तारीफ के सुर में चहका और सैनिकों वाली अन्डरपैन्ट्स में लीदच्का की कल्पना करके आनंद से थरथरा गया. उसने फ़ौरन एक कोरा कागज़ निकाला और तीन मिनट में लिख डाला:

“टेलिफ़ोनोग्राम:

प्रमुख कर्मचारी- उपविभाग के प्रति पूर्ण विराम

आपके नोट N  O, 15015 (6) दिनांक 19, अल्पविराम  के जवाब में ‘आधार प्रमुख सूचित करते हैं अल्पविराम, कि टाईपिस्टों को और सभी महिलाओं को समयानुसार सैनिकों वाली अन्डरपैन्ट्स दी जाएंगी विराम.

प्रमुख डैश हस्ताक्षर

क्लर्क डैश हस्ताक्षर वर्फलामेय करत्कोव विराम”.  

उसने घंटी बजाई और प्रकट हुए कुरियर पंतेलिमोन से कहा:

“मैनेजर के पास दस्तखत के लिए.”

पंतेलिमोन ने अपने होंठ चबाये, कागज़ लिया और निकल गया.

इसके चार घंटे बाद करत्कोव अपने कमरे से बाहर निकले बिना, कान देकर सुन रहा था, इस उम्मीद से, कि अगर नया मैनेजर दफ्तर का राउण्ड लेने की सोचे, तो उसे काम में डूबा हुआ पाए. मगर भयानक कमरे से किसी भी तरह की आवाजें नहीं आ रही थीं. सिर्फ एक बार अस्पष्ट सी फौलादी आवाज़ आई थी, जैसे किसी को नौकरी से निकालने की धमकी दे रही हो, मगर किसे, ये करत्कोव ने नहीं सुना, हालांकि उसने चाभी के छेद से कान चिपका लिया था.

दोपहर को साढे तीन बजे दफ्तर में पंतेलिमोन की आवाज़ गूँजी:

“कार में चले गए.”

दफ्तर में फ़ौरन शोर-गुल होने लगा और सब भाग गए. सबसे अंत में कॉम्रेड करत्कोव अकेला घर गया.

Wednesday, 19 October 2022

शैतानियत - ०२

 

    उत्पादित सामग्री

 

इस घटना के तीन दिन बाद, उस स्वतन्त्र कमरे का दरवाज़ा खुला, जिसमें कॉम्रेड करत्कोव काम कर रहा था, थोड़ा सा खुला और एक महिला के रोये हुए सिर ने कड़वाहट से कहा:

“कॉम्रेड करत्कोव, जाइए, तनख्वाह ले लीजिये.”

“क्या?” करत्कोव खुशी से चहका, और सीटी पर “कार्मेंन” की धुन बजाते हुए उस कमरे की और भागा, जिस पर लिखा था “कैशियर”. कैशियर की मेज़ के पास वह रुका और उसका मुँह पूरा खुल गया. दो मोटे-मोटे स्तम्भ, जो पीले पैकेटों से बने हुए थे, छत तक पहुँच रहे थे. किसी भी तरह के सवाल का जवाब देने से बचने के लिए पसीने से तर और परेशान कैशियर ने दीवार पर अथोरिटी लेटर टांक दिया था, जिस पर अब हरी स्याही में तीसरी टिप्पणी प्रगट हो गई थी:

“ उत्पादित वस्तुओं से भुगतान किया जाए.

ब्लगायिव्लेन्स्की के लिए – प्रीअब्राझेन्स्की.  

और मैं भी पुष्टि करता हूँ – क्षेसिन्स्की”.

बेवकूफी से चौड़ी मुस्कान बिखेरते हुए करत्कोव कैशियर के कमरे से बाहर आया. उसके हाथों में थे चार बड़े,पीले बंडल्स, पाँच हरे, छोटे, और जेबों में थे दियासलाइयों के तेरह पैकेट्स. अपने कमरे में ऑफिस में हो रही आश्चर्यचकित आवाजों का हो-हल्ला सुनते हुए, उसने सारी दियासलाइयां आज के अखबार के सबसे बड़े पृष्ठों में लपेटीं, और किसी से भी बिना कुछ कहे, दफ्तर से घर चला गया.

‘मासा के प्रवेश द्वार के पास वह एक कार के नीचे आते-आते बचा, जिसमें कोई आ रहा था, मगर कौन, यह करत्कोव नहीं देख पाया.

घर आने के बाद, उसने माचिस के डिब्बों को मेज़ पर रखा और, दूर हटकर, प्यार से उनकी और देखने लगा.

बेवकूफी भरी मुस्कान उसके चहरे से नहीं ढली. इसके बाद करत्कोव ने अपने भूरे बालों में उंगलियाँ फेरीं और अपने आप से कहा:

“देर तक निराश होने जैसा कुछ नहीं है. इन्हें बेचने की कोशिश करेंगे.”

उसने अपनी पड़ोसन, अलेक्सान्द्रा फ्योदरव्ना का दरवाज़ा खटखटाया, जो ‘शावाडी  (शासकीय वाईन डिपो) में काम करती थी.

“आईये,” कमरे में एक खोखली आवाज़ गूँजी.

करत्कोव भीतर गया और – भौंचक्का रह गया. दफ्तर से जल्दी लौटकर ओवरकोट और टोपी पहनी अलेक्सान्द्रा फ्योदरव्ना फर्श पर उकडूं बैठी थी. उसके सामने अखबारी कागज़ के कॉर्क वाली बोतलों की लाईन लगी थी, जिनमें गहरे लाल रंग का द्रव भरा हुआ था. अलेक्सान्द्रा फ्योदरव्ना का चेहरा रोया हुआ लग रहा था.

“४६,” उसने कहा और करत्कोव की और मुडी.  

“क्या ये स्याही है?...नमस्ते, अलेक्सान्द्रा फ्योदाराव्ना,” स्तब्ध रह गए करत्कोव ने कहा. 

“चर्च वाईन,” पड़ोसन ने सिसकी लेकर जवाब दिया.

“क्या, आपको भी?” करत्कोव हांफने लगा.

“क्या आपको भी चर्च वाइन?” अलेक्सान्द्रा फ्योदरव्ना को अचरज हुआ.

“हमें – माचिस,” बुझी हुई आवाज़ में करत्कोव ने जवाब दिया और जैकेट का बटन घुमाने लगा.

“अरे, वो तो जलती ही नहीं हैं!” उठते हुए और अपने स्कर्ट को झटकते हुए अलेक्सान्द्रा फ्योदरव्ना चीखी.

“ऐसे कैसे नहीं जलतीं हैं?” करत्कोव घबरा गया और अपने कमरे में लपका. वहाँ एक भी मिनट खोये बिना, उसने डिब्बा पकड़ा, चरमराहट से उसे फाड़ा और माचिस की तीली घिसी. वह फुफकारते हुए हरी लौ के साथ भड़क उठी, टूट गई और बुझ गई. गंधक की तीखी गंध से करत्कोव का दम घुटने लगा, दर्द से खांसते हुए उसने और दूसरी तीली जला दी. उसमें से तीर की तरह दो ज्वालाएं निकलीं. पहली खिड़की के शीशे से टकराई, और दूसरी – कॉम्रेड करत्कोव की बाईं आँख से.

“आ-आह!’ करत्कोव चिल्लाया और माचिस गिरा दी.

कुछ पल वह किसी गरम घोड़े की तरह पैर पटकता रहा, और हथेली से आँख को दबाये रहा. फिर खौफ से शेविंग मिरर में अपना चेहरा देखा, इस यकीन के साथ कि आँख खो गई है. मगर आँख अपनी जगह पर ही थी. ये सच है कि वह लाल हो गई थी और आंसू टपका रही थी.

“ओह, माय गॉड!” करत्कोव परेशान हो गया, उसने फ़ौरन दराज़ से अमेरिकन बैंडेज का पैकेट निकाला. सिर के बाईं ओर वाले आधे हिस्से पर बाँध दिया और युद्ध में ज़ख़्मी हुए सैनिक की तरह लगने लगा.   

पूरी रात करत्कोव ने लाईट नहीं बुझाई और तीलियाँ जलाते हुए लेटा रहा.

इस तरह से उसने तीन डिब्बे जला दिये, जिससे वह ६३ तीलियाँ जलाने में कामयाब हो गया. 

“झूठ बोलती है, बेवकूफ,” करत्कोव बुदबुदाया, “बढ़िया तीलियाँ हैं.”

सुबह तक कमरा गंधक की दमघोंटू गंध से भर गया था. सुबह-सुबह करत्कोव की आंख लगी और वह बेवकूफी भरा, डरावना सपना देखता रहा : जैसे एक हरे मैदान में उसके सामने एक खूब बड़ी, पैरों पर खडी बिलियार्ड की गेंद प्रकट हो गई. ये इतना अजीब था कि करत्कोव चीख मारकर उठ गया. धुंधले अँधेरे में उसे करीब पांच सेकण्ड ऐसा लगा कि गेंद वहीं, पलंग के पास ही है, और उससे गंधक की तेज़ बू आ रही है.

मगर फिर यह सब ख़त्म हो गया; करवट बदल कर करत्कोव सो गया और फिर उसकी नीद नहीं टूटी.

शैतानियत - ०१

  

शैतानियत

कहानी इस बारे में कि कैसे जुड़वां भाइयों ने क्लर्क को मार डाला

लेखक: मिखाइल बुल्गाकाव

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

 

१.   बीस तारीख की घटना

 

उस समय, जब सब लोग एक नौकरी से दूसरी पर उछल रहे थे, कॉम्रेड करत्कोव दृढता से प्रकेआमासा (प्रमुख केन्द्रीय आधार माचिस सामग्री) में क्लर्क की सरकारी नौकरी कर रहा था और वहाँ पूरे ग्यारह महीनों से काम कर रहा था.

‘मासा’ में तपने के बाद, नाज़ुक, खामोश तबियत भूरे बालों वाले करत्कोव ने अपने मन से इस ख़याल को पूरी तरह मिटा दिया था कि दुनिया में तथाकथित किस्मत के उलटफेर भी होते हैं, और उसके बदले उसने ये विश्वास पाल लिया था कि वह, करत्कोव – मासा में दुनिया में ज़िंदगी ख़त्म होने तक काम करता रहेगा. मगर, आह, ऐसा बिलकुल नहीं हुआ...

20 सितम्बर 1921 को ‘मासा’ के कैशियर ने अपनी घिनौनी लम्बे कानों वाली टोपी पहनी, ब्रीफ़केस में ‘अथोरिटी लेटर रखा और चला गया. यह हुआ आधी रात के ग्यारह घंटे बाद.

वापस लौटा कैशियर दोपहर के साढ़े चार बजे, पूरी तरह गीला. वापस आने पर उसने टोपी से पानी झटका, टोपी को मेज़ पर रखा, और कैप पर ब्रीफ़केस रखी और बोला:

“धक्का मत दीजिये, जनाब.”

फिर उसने मेज़ की दराज़ में कुछ टटोला, कमरे से बाहर निकल गया और पंद्रह मिनट बाद एक मरी हुई मुर्गी लेकर आया, जिसकी गर्दन मरोड़ी हुई थी.

मुर्गी को उसने ब्रीफ़केस पर रखा, मुर्गी के ऊपर - अपना दायाँ हाथ रखा और बोला:

“पैसे नहीं मिलेंगे.”

“कल?” – महिलाएं एक सुर में चिल्लाईं. 

“नहीं,” कैशियर ने सिर हिलाया, “और कल भी नहीं मिलेंगे, और परसों भी नहीं. ऐसे चढ़ो नहीं महाशयों, वरना, कॉमरेड्स, आप मेरी मेज गिरा देंगे.”

“क्यों?” भोले-भाले करत्कोव समेत सब चिल्लाए.

“नागरिकों!” रोनी आवाज़ में कैशियर गाने लगा और उसने कोहनी से करत्कोव को झिड़का. “मैं आपसे विनती करता हूँ!”

“अरे, ऐसा कैसे?” सब चिल्लाए और सबसे ऊँची आवाज़ में ये जोकर करत्कोव.

“खैर, फरमाइए,” भर्राई हुई आवाज़ में कैशियर बडबडाया और, ब्रीफ केस से ‘अथोरिटी लेटर’ निकालकर करत्कोव को दिखाया.

उस जगह के ऊपर, जहाँ कैशियर की गंदी उंगली गडी थी, लाल स्याही से तिरछा लिखा हुआ था:

“धन राशि दी जाए.”

हस्ताक्षर - सुबोत्निकव के लिए – सिनात.”

 

उसके नीचे बैंगनी स्याही में लिखा था:

“पैसे नहीं हैं.”

हस्ताक्षर – इवानोव के लिए – स्मिर्नोव”.     

“ऐसा कैसे?” अकेला करत्कोव चीखा, और बाकी के, हांफते हुए कैशियर के ऊपर पिल पड़े.

“आह, मेरे खुदा!: वह बदहवासी से चिल्लाया. “इसमें मेरा क्या कुसूर है? मेरे खुदा!”

जल्दी से अथोरिटी लेटर ब्रीफ़केस में घुसाकर, उसने टोपी पहन ली, ब्रीफकेस बगल में दबाई, मुर्गी बगल में दबाई और चिल्लाया: “जाने दीजिये, प्लीज़!” – और ज़िंदा दीवार में दरार बनाकर वह दरवाज़े में गायब हो गया.

उसके पीछे कीं-कीं करते हुए बदरंग, ऊँची, नुकीली एडियों वाले जूतों में  रिसेप्शनिस्ट भागी, बाईं एडी ठीक दरवाज़े के पास चरमरा कर गिर गई, रिसेप्शनिस्ट लड़खड़ाई, उसने पैर उठाया और जूता निकाल दिया.

और कमरे में वह रह गई – एक नंगा पैर लिए, और बाकी सब, जिनमें करत्कोव भी था.

खान का अग्निकांड

  खान का अग्निकांड लेखक: मिखाइल बुल्गाकव  अनुवाद: आ. चारुमति रामदास    जब सूरज चीड़ के पेड़ों के पीछे ढलने लगा और महल के सामने दयनीय, प्रक...